Tuesday 21 October 2014

लेखक बनोगो, खाने के लाले पड़ जाएंगे

क्लास में सभी स्टूडेंट्स नए प्रफेसर का इंतजार कर रहे थे। कुछ देर बाद नए प्रफेसर साहब क्लास में प्रवेश किए। आते ही उन्होंने कहा कि आज मेरा पहला दिन है, चलिए सबसे पहले आपलोगों के परिचय से क्लास की शुरुआत करते हैं। उन्होंने कहा कि आप लोग अपना नाम और जीवन में क्या बनना चाहते हैं, जरूर बताइएगा। पहली लाइन में बैठे स्टूडेंट अपना नाम और उन्हें क्या बनना है, बताने लगे। कोई कहता मैं इंजीनियर बनूंगा, कोई कहता मैं डॉक्टर बनूंगा, कोई कहता मैं आईएएस बनूंगा कोई आईपीएस। ऐसे ही क्लास में ये शब्द बार-बार सुनने को मिल रहे थे। प्रोफेसर साहब ये सारे शब्द सुनकर काफी खुश होते और गर्व के भाव से उन बच्चों की तरफ देखते। अब नंबर पिछली लाइन में बैठे स्टूडेंट्स का था। मैंने अपना परिचय दिया और कहा कि मैं लेखक बनना चाहता हूं। सर के चेहरे पर तुरंत व्यंग के भाव आ गए। उन्होंने कहा, अच्छा तो आप का जैसा नाम है, कुछ वैसा ही करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि बड़ी कठिन डगर होती है लेखकों की, पर मेहनत करेंगे तो कुछ तो आपको जरूर मिल जाएगा। मेरे बगल में मेरा दोस्त बैठा था, उसने परिचय दिया और कहा कि मैं पत्रकार बनना चाहता हूं। उसने जैसे ही कहा, सर हंसने लगे और कहा कि पत्रकार बनना चाहते हो, खाने के लाले पड़ जाएंगे। देख रहे हो न यहां के पत्रकारों को ‘दलाली’ करके अपना पेट पाल रहे हैं ( दरअसल उनका इशारा स्ट्रींगर की तरफ था)। इसके बाद रिया त्रिपाठी का नंबर आया। वह जैसे ही खड़ा हुईं, वैसे सर ने कहा कि आप तो दार्शनिक बनना चाहती होंगी, क्योंकि आपके बेंच पर बैठे एक शख्स लेखक बनना चाहते हैं, दूसरे पत्रकार तो जाहिर है कि आप दार्शनिक बनना चाहती होंगी। उन्होंने कहा कि सर आपने तो मेरे मन की बात जान ली। इस पर सर बिफर पड़े और कहा कि पता नहीं इस क्लास में ये तीन लोग कहां से आ गए हैं। इस पर मेरे दोस्त ने पूछा कि सर आखिर अपने समाज में डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, आईपीएस और मैनेजमेंट को ही सफलता की निशानी क्यों माना जाता है? क्या हम कुछ दूसरा नहीं कर सकते हैं? सर ने बड़े ही दार्शनिक अंदाज में कहा कि तुम लोग अभी बच्चे हो, दुनिया नहीं देखी है। जिस दिन देखोगे उस दिन वक्त के आगे तुरंत घुटना टेक दोगे। उन्होंने कहा कि डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस, आईपीएस और मैनेजमेंट को सफलता की निशानी इसलिए माना जाता है क्योंकि इसमें पैसा और पावर है, समाज की नजरों में सफल जीवन जीने के लिए ये दोनों काफी जरूरी हैं। इस पर मेरा दोस्त बोला, सर आपने सही कहा कि समाज की नजरों में सफल जीवन जीने के लिए ये दोनों जरूरी हैं, पर हमें समाज की नजरों में सफल जीवन न जीना हो तो? अगर हम कहें कि ये दोनों चीजें हमें नहीं चाहिए तो? इस पर सर गुस्से से पागल हो गए और कहा कि अभी तक तो मैं समझ रहा था कि तुम्हारे पास अक्ल नहीं अब मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि तुम बेवकूफ और बदतमीज के साथ-साथ पागल भी हो। तुम मुझसे तर्क कर रहे हो, मैं घास छीलकर यहां नहीं आया हूं। तुम जैसे लड़के की औकात नहीं है कि मुझसे इस कदर बात करो।
पर मेरा दोस्त रुकने वाला नहीं था। उसने आगे कहा, सर जहां तक मेरा मानना है कि डॉक्टरी, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट एक प्रकार का प्रशिक्षण है। इससे स्कील तो डवलप होता है, पर बौद्धिक विकास हो, इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती है। जैसा कि आपने कहा कि इसमें पैसे बहुत हैं, तो मैं एक बिजनेस फैमिली से आता हूं, मुझे अगर पैसा ही कमाना होता तो मैं बिजनेस ही करता न उसमें ज्यादा पैसा है। उसने कहा कि सर हमें डॉक्टरी, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट पढ़ने वालों से कोई दिक्कत नहीं है। मैं उनकी इज्जत करता हूं, पर मैं जो करना चाहता हूं उससे तो मुझे किसी को रोकने का कोई अधिकार नहीं है। उसने आगे कहा, दरअसल समाज ने कुछ खोखले मानदंड तय किए हैं, जिसे तथाकथित पढ़े लिखे लोग ढो रहे हैं। हमारी प्रवृति ही ऐसी है कि हम पैसा और पावर चाहते हैं और एक दूसरे से खुद को ऊंचा दिखाने में गर्व महसूस करते हैं। उसने कहा कि अगर इस देश में भ्रष्टाचार है तो इसका एक प्रमुख कारण यह प्रवृति भी है। मुझे दुख है कि आप इसी प्रवृति का समर्थन कर रहे हैं। इतना सुनने के बाद सर भड़क गए। उन्होंने तुरंत मेरे दोस्त को क्लास से बाहर निकाल दिया और कहा कि आप मेरे क्लास में फिर कभी दिखाई नहीं देना। अब बारी रिया त्रिपाठी की थी। उन्होंने कहा कि आप दार्शनिक बनना चाहती हैं न, जरूर बनिए। वैसे भी आप लड़की हैं, आपको तो घर चलाना नहीं है, आप जो मन करे करें। उन्होंने उसका जोरदार विरोध किया। मैंने भी कहा कि सर आपको लिंग के आधार पर किसी को नीचा दिखाने का कोई हक नहीं है। सर ने कहा कि आप दोनों भी क्लास से बाहर जाइए, आप लोग फिर मेरे क्लास में दिखाई मत दीजिएगा। हम तीनों क्लास से बाहर हो गए और कभी भी उनके क्लास में नहीं गए। बाद में सुना कि उस सर ने काफी तरक्की की और हेड ऑफ द डिपार्टमेंट बनकर रिटायर हुए।

ये बातें इसलिए याद आ गईं क्योंकि मेरे उस दोस्त का एक दो दिन पहले फोन आया था और उसने बताया कि रिया त्रिपाठी आजकल दर्शन शास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर हैं और उनका नंबर दिया। रिया से बात हुई और उस दिन को याद करके हम लोग खूब हंसे। बातों-बातों में मैंने रिया से पूछा कि आपने शादी कर ली, उन्होंने कहा कि नहीं यार, मुझे सर की बात अभी तक याद है कि मैं तो लड़की हूं और मुझे घर थोड़ी ही चलाना है। उन्होंने मुझसे सवाल किया कि क्या इस देश में लड़की का स्वतंत्र जीवन नहीं हो सकता? क्या किसी लड़की को जीवन जीने के लिए पुरुष का हाथ थामना जरूरी है। क्या हम अपने जीवन का खुद मुख्तार नहीं बन सकते। मैंने कहा, क्यों नहीं। यह जीवन आपका है और आप जिस तरह से जीना चाहें, वह आपका एकाधिकार है। पिछले दो-तीन दिनों से मैं सोच रहा हूं कि ऐसा क्यों है कि हमने जीवन में सफलता के कुछ मानदंड तय कर दिए हैं और हर शख्स को उसी मानदंड पर खरा उतरना होता है, अगर वह खरा उतरा तो सफल और अगर नहीं तो असफल। पता नहीं यह सब कब बदलेगा और कब हम लोग सुधरेंगे और अन्य प्रफेशन की इज्जत करना सीखेंगे।

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